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भारत के अंतिम गांव से लेकर मुनस्यारी तक जैव विविधता का अद्भुत संसार

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Nainital: उत्तराखंड अपनी भौगोलिक स्थितियों के साथ ही जैव विविधता के लिए भी प्रसिद्ध है। उत्तराखंड वन अनुसंधान केंद्र ने पिछले एक वर्ष में जैव विविधता के लिए चीन सीमा से सटे देश के अंतिम गांव माणा से लेकर मुनस्यारी तक अनूठे प्रयास किए हैं। हर्बल गार्डन, आर्किड गार्डन, लाइकेन गार्डन, पाम गार्डन, एरोमेटिक गार्डन, क्रिप्टोमेटिक गार्डन व फर्न प्रजाति संरक्षण केंद्र भी विकसित किए हैं। वन अनुसंधान केंद्र के मुताबिक यहां संरक्षित प्रजातियों का दुर्लभता, औषधीय और स्थानीयता के हिसाब से खासा महत्व है। वन अनुसंधान के मुताबिक वनस्पतियों के संरक्षण को लेकर इस बात पर खास फोकस किया जाता है कि उनका पर्यावरण से लेकर आम इंसान के लिए व्यक्तिगत तौर पर क्या महत्व है। वह संकटग्रस्त श्रेणी में तो नहीं। इसके मुताबिक ही संरक्षण को लेकर योजना तैयार की जाती है।

माणा गांव में 11 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित हर्बल गार्डन में औषधीय गुणों से युक्त 40 प्रजातियों को जनसहभागिता के जरिये तैयार किया गया है। इसके अलावा मुनस्यारी के लाइकेन गार्डन में डेढ़ साल पहले देश का पहला लाइकेन गार्डन तैयार किया। जिसमें लाइकेन की 120 प्रजातियों को संरक्षित किया गया है। लाइकेन जिसे स्थानीय लोग झूला घास के नाम से भी जानते हैं। प्रदूषण का इंडिकेटर मानी जाती है।

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